दृग सागर
देखे नयन के एक झलक में,
अंबक में थी गहरी सागर।
त्रिया नहीं ये वामा थी,
जो छिपा रही विकल पलको पर।
धात्री थी नवजात शिशु की,
वक्षांशो से था देना आकार।
छोड़-छाड़ सब निकल पड़ी,
वे करने सपनों को साकार।
भली-भांति स्नेह से परिचित,
ममता की वो थी जननी।
उज्जवल भविष्य की कामना,
कठोर श्रम को थी करनी।
हृदय अंश से पृथक् होकर,
दृग अश्रु घूंट को पीती थी।
वक्ष स्थल की पीयूष स्त्रोत को,
ढकती फिरती रोती थी।
प्रवाल नहीं ना मूढ़ रही,
जीवन भंजक से बस युद्ध रहा।
स्कंध की एक चाह रही,
जो संयत नारी के विरुद्ध रहा।
उल्लास नहीं ना मेघ सी गरजन,
ना सिंह की दहाड़ थी।
जीवन के समतल रेखा पर,
विकट सी खड़ी पहाड़ थी।